लखनऊ के कवि ने सोशल मीडिया पर लिखा – न तो मुझे मेले वालो का कोई फोन आया, न मुझे आमंत्रित किया फिर भी मेरी फोटो छाप रखी है।
मंदसौर का प्रसिद्ध मेला इन दिनों सुर्खियों में जरूर है, लेकिन अच्छे कारणों से नहीं। नगरपालिका प्रशासन एक के बाद एक ऐसे विवादों में फंसता चला जा रहा है कि उसकी कार्यशैली पर उंगलियां उठना लाजमी हो गया है। अभी कैलाश खेर वाला बवाल ठंडा भी नहीं हुआ था कि कवि सम्मेलन के पोस्टर ने नया बखेड़ा खड़ा कर दिया। दोनों ही मामले सोशल मीडिया पर इतनी तेजी से वायरल हुए कि नगरपालिका की खूब किरकिरी हो रही है।

पहला मामला गायक कैलाश खेर के कार्यक्रम से शुरू हुआ। उनके द्वारा मंच पर कहे गए कुछ शब्दों को लेकर लोगों में भारी नाराजगी फैल गई। सोशल मीडिया पर आलोचना का दौर चल पड़ा तो नगरपालिका के एक सभापति ने सफाई देने के चक्कर में फेसबुक पर लिख दिया कि कैलाश खेर को जीएसटी और टीडीएस काटकर कुल 32 लाख रुपए का भुगतान कर दिया गया है। यह पोस्ट जैसे ही वायरल हुई, सत्ताधारी भाजपा की ही एक महिला पार्षद आगे आ गईं और सार्वजनिक रूप से मांग करने लगीं कि “कैलाश खेर का भुगतान रोका जाए।” यानी एक तरफ सभापति कह रहे हैं कि पैसा दे दिया, दूसरी तरफ उनकी ही पार्टी की पार्षद कह रही हैं कि पैसा मत दो। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि अपने ही पार्षदों को नहीं पता कि मेले के सबसे बड़े कार्यक्रम का भुगतान हुआ भी है या नहीं। प्रशासनिक समन्वय की यह हालत देखकर आम जनता हंस भी रही है और गुस्सा भी कर रही है।
इसी बीच दूसरा मामला और जोर पकड़ने लगा। मेले में आयोजित अखिल भारतीय कवि सम्मेलन का पोस्टर जारी हुआ तो उसमें लखनऊ के चर्चित कवि पंकज प्रसून की बड़ी-सी फोटो लगी दिखी। पोस्टर देखकर लगा कि पंकज प्रसून मुख्य आकर्षण हैं। लेकिन थोड़ी देर बाद खुद पंकज प्रसून ने अपने फेसबुक वॉल पर पोस्ट डाल दी – “मंदसौर के मेले में आज कवि सम्मेलन है। मेले वालों का कोई फोन नहीं आया, कोई आमंत्रण पत्र नहीं मिला। फिर भी मेरी फोटो छाप रखी है। क्या किया जाए भाइयो?” इस पोस्ट के अलावा उन्होंने नगरपालिका अध्यक्ष रमादेवी गुर्जर को एक पत्र भी लिखा। अब पूरा सोशल मीडिया यही पूछ रहा है कि बिना बुलाए किसी कवि की फोटो पोस्टर में क्यों और कैसे लगा दी गई? हालांकि बाद में उन्होंने पोस्ट हटा ली।

दोनों मामले एक साथ जुड़कर नगरपालिका की कार्यप्रणाली पर बड़ा सवाल खड़ा कर रहे हैं। जहां एक तरफ लाखों रुपए के भुगतान में पारदर्शिता और समन्वय का अभाव दिख रहा है, वहीं दूसरी तरफ कवि सम्मेलन जैसे साहित्यिक आयोजन में भी इस तरह की लापरवाही सामने आ रही है। सबसे बड़ा शक यह है कि कवि सम्मेलन के सूत्रधार या आयोजक शायद बड़े-बड़े नामों की फोटो लगाकर बजट बढ़वाने की फिराक में हों। अगर ऐसा है तो यह सीधे-सीधे जनता के पैसे से खिलवाड़ है।
नगरपालिका प्रशासन को अब चुप बैठने की बजाय तुरंत सक्रिय होना चाहिए। कवि सम्मेलन के आयोजक/सूत्रधार से लिखित स्पष्टीकरण मांगा जाए कि बिना अनुमति फोटो कैसे लगी। साथ ही यह भी जांच हो कि किन-किन कवियों को वाकई बुलाया गया है और किनके नाम सिर्फ दिखावे के लिए जोड़े गए हैं।
मेला शहर की पहचान है, गौरव है। लेकिन इस तरह की लापरवाही और असमंजस से यह गौरव लगातार धूमिल हो रहा है।
Author: Dashpur Disha
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