लोकायुक्त के विधि सलाहकार ने चार विभागों के आयुक्तों को पत्र लिखकर पूछा – डॉ.नलवाया पर क्या कार्रवाई की, आज होगी पेशी
दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल
मंदसौर। जिले में नर्सिंग और पैरामेडिकल कोर्सों में छात्रवृत्ति वितरण में हुई अनियमितताओं का मामला एक बार फिर सुर्खियों में है। सामाजिक कार्यकर्ता और पत्रकार योगेश पोरवाल द्वारा वर्ष 2016-17 में दर्ज की गई लोकायुक्त शिकायत में तत्कालीन प्राचार्य डॉ. भोपराज नलवाया, आदिम जाति कल्याण विभाग के तत्कालीन जिला संयोजक आनंदराय सिंहा, छात्रवृत्ति शाखा के बाबू कृष्णकांत श्रीवास्तव, अन्य पिछड़ा वर्ग के बाबू दीपक लोठ, और दो निजी नर्सिंग व पैरामेडिकल कॉलेज संचालकों सहित 12 लोगों के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए गए थे। इस मामले में अब नया मोड़ आया है, जिसमें उच्च शिक्षा विभाग के जांच अधिकारियों के साथ, तत्कालीन प्रभारी प्राचार्य डॉ.दिनेश चंद्र गुप्ता भी संदेह के घेरे में हैं। डॉ.डीसी गुप्ता पर आरोप है कि उन्होंने प्रभारी प्राचार्य रहते हुए डॉ. नलवाया को लोकायुक्त जांच प्रकरण प्रचलित होने और विभागीय कार्रवाई प्रचलित होने के बावजूद नो ड्यूज जारी कर पेंशन स्वीकृत कर दी। डॉ.नलवाया ने भी लोकायुक्त प्रकरण को छिपाया इसलिए दोनों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने की संभावना प्रबल हो गई है।

लोकायुक्त शिकायत और जांच की शुरुआत
पत्रकार योगेश पोरवाल ने 2016-17 में लोकायुक्त में शिकायत दर्ज कराई थी कि नर्सिंग और पैरामेडिकल कोर्सों में छात्रवृत्ति वितरण में अनियमितताएं हुई हैं, जिसमें लाखों रुपये का गलत भुगतान किया गया। प्रारंभिक जांच में पर्याप्त तथ्य होने के बावजूद, जिला स्तर पर गठित जांच समितियों ने कथित तौर पर अधिकारियों को बचाने और मामले को दबाने का प्रयास किया। हालांकि, 2021 से 2023 के बीच मंदसौर के तत्कालीन कलेक्टर गौतम सिंह के कार्यकाल में इस प्रकरण की जांच में तेजी आई। कलेक्टर ने निष्पक्षता बरतते हुए जांच को आगे बढ़ाया।
जांच में हुआ बड़ा खुलासा
आदिम जाति कल्याण विभाग की तत्कालीन जिला संयोजक रेखा पांचाल और अन्य पिछड़ा वर्ग विभाग के सहायक संचालक तीरथ गरमें द्वारा सौंपी गई अंतिम जांच रिपोर्ट में साढ़े सात लाख रुपये से अधिक की राशि नर्सिंग कॉलेज के विद्यार्थियों को अनुचित रूप से वितरित होने की पुष्टि हुई। इस रिपोर्ट के आधार पर एक निजी कॉलेज संचालक के खिलाफ एफआईआर का प्रस्ताव तैयार किया गया। हालांकि, कॉलेज संचालक ने अतिरिक्त राशि शासन के खाते में जमा कराकर मामला सुलझाने की सहमति दे दी। इसके बाद प्रकरण में आगे की कार्रवाई के लिए नस्ती लोकायुक्त के पास पहुंची।
निर्दोष प्राचार्य को फंसाकर, दोषी की पेंशन जारी कर दी
लोकायुक्त की शिकायत के आधार पर आदिम जाति कल्याण विभाग के तत्कालीन जिला संयोजक आनंदराय सिंहा और संबंधित बाबुओं के खिलाफ विभागीय जांच शुरू हुई। कलेक्टर गौतम सिंह ने तत्कालीन प्राचार्य डॉ. भोपराज नलवाया के खिलाफ कार्रवाई के लिए शासन को पत्र लिखा। लेकिन इस प्रक्रिया में केवल नाम न लिखने से पूरी जांच में नया मोड दे दिया गया। कलेक्टर के पत्र में “तत्कालीन प्राचार्य” शब्द का लिखने के कारण डॉ. नलवाया की बजाय पूर्व प्राचार्य एलएन शर्मा और गरोठ कॉलेज के प्राचार्य नंदकिशोर धनोतिया के खिलाफ उच्च शिक्षा विभाग ने विभागीय जांच शुरू कर दी। दोनों निर्दोष प्राचार्य रिटायरमेंट के बाद भी अपनी पेंशन के लिए संघर्ष करते रहे।
डॉ.डीसी गुप्ता के कार्यकाल में जारी हुआ डॉ.नलवाया को नो ड्यूज
प्रकरण में नया विवाद तब सामने आया जब प्रोफेसर डॉ.डीसी गुप्ता ने, जो उस समय प्रभारी प्राचार्य थे, लोकायुक्त जांच प्रचलित होने के बावजूद 7 नवंबर 2024 को डॉ. भोपराज नलवाया के लिए “नो ड्यूज” प्रमाणपत्र जारी कर दिया। यह प्रमाणपत्र नियमों के विपरीत था, क्योंकि किसी भी शासकीय सेवक के खिलाफ विभागीय जांच प्रचलित होने पर नो ड्यूज जारी नहीं किया जा सकता। इस कदम को अपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा मानते हुए लोकायुक्त ने इसे गंभीरता से लिया।
चार विभागों के आयुक्तों को लोकायुक्त विधि सलाहकार ने लिखा पत्र
18 जून 2025 को लोकायुक्त के विधि सलाहकार ने उच्च शिक्षा विभाग के अपर मुख्य सचिव, आदिम जाति कल्याण विभाग के आयुक्त, अनुसूचित जाति कल्याण विभाग के आयुक्त, और अन्य पिछड़ा वर्ग के आयुक्त को पत्र लिखकर पूछा कि जांच प्रकरण 194/17 में डॉ. नलवाया के खिलाफ छात्रवृत्ति वितरण में अनियमितताओं के संबंध में क्या कार्रवाई की जा रही है। साथ ही, 16 जुलाई 2025 को इन चारों अधिकारियों की पेशी भी आहूत की गई है, जिसमें प्रकरण की समस्त जानकारी और नियमावली मांगी गई है।
उच्च शिक्षा विभाग की मुश्किलें बढ़ी
उच्च शिक्षा विभाग अब असमंजस में है, क्योंकि जिस डॉ. नलवाया के खिलाफ कार्रवाई होनी थी, उनकी पेंशन प्रक्रिया पूरी हो चुकी है, जबकि निर्दोष प्राचार्यों की पेंशन रोक दी गई। इस गलती ने न केवल विभागीय जांच की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं, बल्कि डॉ. डीसी गुप्ता की भूमिका को भी संदिग्ध बना दिया है। उनकी ओर से फर्जी तरीके से नो ड्यूज प्रमाणपत्र जारी करना अपराधिक षड्यंत्र (भारतीय न्याय संहिता की धारा 61(2), पूर्व में IPC की धारा 120बी) के तहत दंडनीय हो सकता है। क्योंकि डॉ.भोपराज नलवाया ने स्वयं लोकायुक्त को लिखे पत्र में ये स्वीकारोक्ति दी थी कि उनके नोडल रहते ही छात्रवृत्ति प्रकरण स्वीकृत हुए थे। लंबे समय से लोकायुक्त और शासन स्तर से पीजी कॉलेज में इस प्रकरण में पत्राचार भी हो रहा था उसके बावजूद आर्थिक अनियमितता जैसे लोकायुक्त प्रकरणों को नजर अंदाज कर पेंशन प्रकरण के लिए नो ड्यूज जारी करना संदेहास्पद है।
Author: Yogesh Porwal
वर्ष 2012 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र हमवतन, भोपाल मेट्रो न्यूज, पद्मिनी टाइम्स में जिला संवाददाता, ब्यूरो चीफ व वर्ष 2015 से मन्दसौर से प्रकाशित दशपुर दिशा समाचार पत्र के बतौर सम्पादक कार्यरत, एवं मध्यप्रदेश शासन द्वारा जिला स्तरीय अधिमान्य पत्रकार है। पोरवाल, खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित है तथा खोजी पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित भी किए जा चुके है। योगेश पोरवाल ने इग्नू विश्वविद्यालय दिल्ली एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा और मास्टर डिग्री प्राप्त की, इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम और वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय से सायबर कानून में अध्ययन किया है।









