मंदसौर। मध्यप्रदेश के मंदसौर जिले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के जिला मंत्री नरेंद्र पाटीदार ने पार्टी के स्पष्ट आदेशों की अवहेलना करते हुए नियमों को ताक पर रख दिया। 16 मई, 2025 को आयोजित जिला पंचायत की साधारण सभा की बैठक में नरेंद्र पाटीदार अपनी पत्नी निर्मला पाटीदार की जगह शामिल हुए, जो जिला पंचायत की निर्वाचित सदस्य हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने सोशल मीडिया पर इसकी जानकारी साझा करते हुए दावा किया कि उन्होंने बैठक में भाग लिया और अधिकारियों को आवश्यक निर्देश दिए। यह कृत्य न केवल पार्टी के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण से भी अनुचित है, क्योंकि उन्हें इस बैठक में भाग लेने या निर्देश देने का कोई अधिकार नहीं है।
जिला पंचायत की बैठक में नरेंद्र पाटीदार का अपनी पत्नी के स्थान पर उपस्थित होना और अधिकारियों को निर्देश देने का दावा करना कई सवाल खड़े करता है। निर्मला पाटीदार जिला पंचायत की सदस्य हैं, और नियमों के अनुसार, ऐसी बैठकों में केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही भाग ले सकते हैं। नरेंद्र पाटीदार ने न केवल इस नियम की अवहेलना की, बल्कि अपनी उपस्थिति को सोशल मीडिया पर प्रचारित भी किया। हैरानी की बात यह है कि बैठक में मौजूद अधिकारियों ने भी इस अनधिकृत उपस्थिति पर कोई आपत्ति नहीं जताई और न ही कोई कार्रवाई की।
भाजपा के आदेशों का उल्लंघन
भाजपा का केंद्रीय नेतृत्व और मध्य प्रदेश सरकार ने बार-बार स्पष्ट किया है कि प्रशासनिक बैठकों और कार्यालयों में केवल निर्वाचित जनप्रतिनिधि ही भाग ले सकते हैं। पति, बेटे या अन्य परिजनों को जनप्रतिनिधि की जगह काम करने की अनुमति नहीं है। इसके बावजूद, नरेंद्र पाटीदार ने इन आदेशों को नजरअंदाज कर अपनी मनमानी की। यह घटना पार्टी के अनुशासन और नियमों के प्रति उनकी उदासीनता को दर्शाती है।
महिला सशक्तिकरण पर सवाल
यह घटना महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक बड़ा झटका है। सरकार ने महिलाओं को समान अवसर और अधिकार देने के लिए पंचायती राज संस्थाओं में 50% आरक्षण लागू किया है, ताकि वे स्वतंत्र रूप से अपनी जिम्मेदारियां निभा सकें। हालांकि, कुछ पुरुष नेता, जैसे नरेंद्र पाटीदार, अपनी पत्नियों को केवल नाममात्र की भूमिका तक सीमित रखते हैं। वे उनकी जगह स्वयं निर्णय लेते हैं और बैठकों में भाग लेते हैं, जिससे महिला जनप्रतिनिधियों की स्वायत्तता और नेतृत्व क्षमता प्रभावित होती है। ऐसे कृत्य सरकार की महिला सशक्तिकरण की मंशा को कमजोर करते हैं।
प्रशासन की चुप्पी
बैठक में नरेंद्र पाटीदार की अनधिकृत उपस्थिति पर अधिकारियों की चुप्पी भी सवालों के घेरे में है। नियमों के अनुसार, ऐसी बैठकों में केवल अधिकृत व्यक्तियों को ही अनुमति दी जानी चाहिए। अधिकारियों का इस मामले में कोई कदम न उठाना प्रशासनिक लापरवाही को दर्शाता है। यदि समय रहते इस तरह की अनियमितताओं पर कार्रवाई नहीं की गई, तो यह प्रवृत्ति अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ सकती है।
आवश्यक है कठोर कार्रवाई
इस घटना ने एक बार फिर यह साबित किया है कि महिला जनप्रतिनिधियों के स्थान पर उनके पुरुष परिजनों की दखलंदाजी को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी घटनाओं पर लगाम लगाने के लिए निम्नलिखित कदम उठाए जा सकते हैं:
▪️कानूनी कार्रवाई: अनधिकृत रूप से बैठकों में शामिल होने वाले व्यक्तियों के खिलाफ स्पष्ट नियम बनाए जाएं और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान हो।प्रशासनिक सख्ती: अधिकारियों को निर्देश दिए जाएं कि वे केवल अधिकृत जनप्रतिनिधियों को ही बैठकों में भाग लेने दें।
▪️जागरूकता अभियान: महिला जनप्रतिनिधियों को उनके अधिकारों और जिम्मेदारियों के प्रति जागरूक किया जाए, ताकि वे स्वतंत्र रूप से अपनी भूमिका निभा सकें।
▪️पार्टी अनुशासन: भाजपा जैसे दलों को अपने नेताओं पर सख्ती बरतनी चाहिए और ऐसे कृत्यों को पार्टी अनुशासन के उल्लंघन के रूप में देखना चाहिए।
नरेंद्र पाटीदार की यह हरकत न केवल भाजपा के नियमों का उल्लंघन है, बल्कि महिला सशक्तिकरण और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए भी एक चुनौती है। यह घटना दर्शाती है कि समाज में अभी भी पुरुष-प्रधान मानसिकता हावी है, जो निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों को उनकी जिम्मेदारियां निभाने से रोकती है। यदि महिला सशक्तिकरण को सही मायने में लागू करना है, तो ऐसी अनियमितताओं पर तत्काल रोक लगानी होगी। प्रशासन और राजनीतिक दलों को इस दिशा में ठोस कदम उठाने की जरूरत है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाएं न दोहराई जाएं।
Author: Dashpur Disha
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