उच्च शिक्षा विभाग की पीएम एक्सीलेंस कॉलेजों में प्राचार्यों की नियुक्ति प्रक्रिया सवालों के घेरे में, हाईकोर्ट ने बताया अवैध

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मन्दसौर पीएम एक्सीलेंस कॉलेज के प्राचार्य डॉ. ज्योतिस्वरूप दुबे से वरिष्ठ प्रोफेसर है डॉ.डीसी गुप्ता और डॉ.आरके वर्मा, किन्तु जूनियर सीनियर से ऊपर पदस्थ है

दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल
मन्दसौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षा विभाग की प्रधानमंत्री उत्कृष्ट महाविद्यालयों (पीएमश्री) में प्राचार्यों और प्राध्यापकों की नियुक्ति प्रक्रिया को कड़ी फटकार लगाई है। न्यायमूर्ति विवेक जैन की एकलपीठ ने कहा कि विभाग ने इस प्रक्रिया का “मजाक” बना दिया, जो अवैध और अतार्किक है। इस मामले में डॉ.यशवंत कुमार मिश्रा और डॉ. मंजू शर्मा की याचिकाओं पर सुनवाई के बाद 04 सितंबर 2025 को यह आदेश पारित किया गया। इस आदेश के आधार पर उच्च शिक्षा विभाग अगर अमल करेगा तो मंदसौर कॉलेज का प्राचार्य भी बदला जाना तय माना जा रहा है।

कोर्ट का फैसला 30 दिन में ले सुधारात्मक कदम
अदालत ने आदेश दिया कि 30 दिनों के भीतर या तो उम्मीदवारों से उतने विकल्प लिए जाएं, जितने कॉलेजों की संख्या है (72), या फिर सामूहिक काउंसलिंग आयोजित की जाए। यदि याचिकाकर्ताओं को उनका पसंदीदा कॉलेज नहीं मिलता और वे नियुक्ति से इंकार करते हैं, तो उन्हें किसी अन्य कॉलेज में पदस्थ किया जाए या उनके वर्तमान कॉलेज में उनसे वरिष्ठ व्यक्ति को प्राचार्य नियुक्त किया जाए।

जूनियर को ऊपर पदस्थ करना न्यायसंगत नहीं
न्यायालय ने कहा कि 72 कॉलेजों के लिए उम्मीदवारों से केवल दो विकल्प लेना और इसके बाद काउंसलिंग न करना मेरिट-आधारित चयन के उद्देश्य को नष्ट करता है। याचिकाकर्ताओं ने शिकायत की थी कि उनसे जूनियर शिक्षकों को प्राचार्य नियुक्त किया गया। कोर्ट ने पाया कि दोनों याचिकाकर्ता अपने प्रतिवादियों से वरिष्ठ हैं और जूनियर को वरिष्ठ पर पदस्थ करना न्यायसंगत नहीं है।

नीति में खामियां
याचिकाकर्ताओं ने 10 वर्ष के शिक्षण अनुभव की अनिवार्यता और मेरिट निर्धारण की पद्धति पर सवाल उठाए थे। हालांकि, अदालत ने कहा कि अनुभव से संबंधित आरोपों के लिए पर्याप्त सबूत नहीं हैं, इसलिए इस आधार को खारिज कर दिया गया। मेरिट निर्धारण को चुनौती इसलिए स्वीकार नहीं की गई, क्योंकि यह नियमित पदोन्नति नहीं, बल्कि केंद्र सरकार की विशेष योजना के तहत श्रेष्ठ शिक्षकों की नियुक्ति थी।

दो विकल्प की व्यवस्था अनुचित
विभाग ने प्राचार्य पद के लिए केवल दो विकल्प भरने का प्रावधान किया था, लेकिन चयन न होने पर वरिष्ठ उम्मीदवार भी प्रक्रिया से बाहर हो गए, जबकि जूनियर प्रोफेसर प्राचार्य बन गए। हाईकोर्ट ने इसे अनुचित करार देते हुए कहा कि 72 कॉलेजों के लिए दो विकल्प लेना मेरिट को खत्म करता है। नीति के पैरा-8 की व्याख्या को अदालत ने मंजूरी नहीं दी और राज्य सरकार को 30 दिनों में सुधार के लिए निर्देशित किया।

प्रोफेसर संघ की प्रतिक्रिया
प्राध्यापक संघ के संरक्षक कैलाश त्यागी ने कहा कि उच्च शिक्षा विभाग को नीति की खामियों से अवगत कराया गया था, लेकिन सुझावों को नजरअंदाज कर त्रुटिपूर्ण व्यवस्था लागू की गई। इससे करीब दो दर्जन प्रोफेसर कोर्ट जाने को मजबूर हुए। उन्होंने मांग की कि गलत नीति बनाने और लागू करने वाले अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो।

ये है मंदसौर कॉलेज की स्थिति
उच्च शिक्षा विभाग मध्यप्रदेश द्वारा जारी 2009 की अंतिम वरिष्ठता सूची में राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मन्दसौर के प्राध्यापक डॉ.डीसी गुप्ता का नाम क्रमांक 93 पर अंकित है। इसके बाद डॉ. आरके वर्मा की वरिष्ठता बनती है। ये दोनों महाविद्यालय मंदसौर में प्राचार्य भी रह चुके है। डॉ.जेएस दुबे का 2009 की अंतिम वरिष्ठता सूची में नाम नहीं है। किन्तु पूरे प्रदेश के 71 पीएम एक्सीलेंस कॉलेजों की तर्ज पर इन्हें भी प्राचार्य बनाया गया है। जिसे हाईकोर्ट ने मजाक बताते हुए सख्त आदेश दिया है।

यह कहना है इनका
हा वरिष्ठता सूची के हिसाब से मैं सीनियर हूं लेकिन मैने स्वयं ने शासन को मना किया था, मेरी प्राचार्य बनने की इच्छा ही नहीं है। मै प्राचार्य नहीं बनना चाहता हूं – डॉ.डीसी गुप्ता प्राध्यापक पीजी कॉलेज मंदसौर

महाविद्यालय में वरिष्ठतम प्राध्यापक के रहते उनकी सहमति के बिना कनिष्ठ प्राध्यापक को प्राचार्य का प्रभार सौंपना विधिसम्मत नहीं है। इससे वरिष्ठतम प्राध्यापक के दीर्घ अनुभव का लाभ भी संस्था को नहीं मिल पाता। प्राचार्य का प्रभार वरिष्ठतम प्राध्यापक को ही सौंपा जाना न्यायोचित है। डॉ.आर.के.वर्मा, पूर्व प्राचार्य राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, मन्दसौर

इस मामले में एक्सपर्ट का व्यू –
1 अप्रैल 2009 की प्राध्यापकों की वरिष्ठता सूची अंतिम उच्च शिक्षा विभाग की वेबसाइट पर उपलब्ध है। उस सूची की वरिष्ठता को ध्यान में रखकर प्रभार सौंपा जाना चाहिए।
उच्च शिक्षा विभाग ने कुछ ऐसे भी प्राध्यापकों को प्रभार दिया है जो उस वरिष्ठता सूची में सम्मिलित नहीं है। कोई वरिष्ठ प्राध्यापक होते हुए प्राचार्य का प्रभार लेने से इंकार करता है तो उस पर विभाग को अनुशासनात्मक कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि प्राचार्य का प्रभार एक दायित्व है अतः दायित्व के निर्वहन से कोई भी प्राध्यापक विमुक्त नहीं हो सकता है। ये जरूर है कि प्राचार्य पद पर पदोन्नति पुरस्कार है और पदोन्नति लेने से प्राध्यापक इनकार कर सकता है।
डॉ.एल.एन.शर्मा
सेवानिवृत प्राचार्य एवं पूर्व डीन विक्रम विश्वविद्यालय उज्जैन

Yogesh Porwal
Author: Yogesh Porwal

वर्ष 2012 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र हमवतन, भोपाल मेट्रो न्यूज, पद्मिनी टाइम्स में जिला संवाददाता, ब्यूरो चीफ व वर्ष 2015 से मन्दसौर से प्रकाशित दशपुर दिशा समाचार पत्र के बतौर सम्पादक कार्यरत, एवं मध्यप्रदेश शासन द्वारा जिला स्तरीय अधिमान्य पत्रकार है। पोरवाल, खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित है तथा खोजी पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित भी किए जा चुके है। योगेश पोरवाल ने इग्नू विश्वविद्यालय दिल्ली एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा और मास्टर डिग्री प्राप्त की, इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम और वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय से सायबर कानून में अध्ययन किया है।

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