नोडल अधिकारी पर कार्रवाई के बजाय कर दी पेंशन, लोकायुक्त को कहते रहे जांच में जनजातीय कार्य विभाग की जिला संयोजक सहयोग नहीं कर रही
✍️दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल

मन्दसौर। लंबे समय से छात्रवृत्ति फर्जीवाड़े की लोकायुक्त जांच को गुमराह करने का प्रयास उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों द्वारा किया जा रहा था। पिछले दिनों जनजातीय कार्य विभाग के द्वारा लोकायुक्त को दिए गए स्पष्ट प्रतिवेदन ने इसकी पोल को पूरी तरह खोल दिया।
दिनांक 10 मार्च 2026 को लोकायुक्त कार्यालय में छात्रवृत्ति फर्जीवाड़े के मामले में हुई पेशी में उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारी बार-बार जिला संयोजक जनजातीय कार्य विभाग मन्दसौर के सहयोग न करने का हवाला दे रहे थे, लेकिन जब जनजातीय कार्य विभाग के सहायक ग्रेड-3 सूर्यप्रताप सिंह कछावा ने जिला संयोजक का पक्ष रखा तो लोकायुक्त के अधिकारी भी सन्न रह गए। विभाग ने साफ बताया कि इस मामले में जांच पूरी हो चुकी है, हमारे विभाग के दोषी अधिकारीकर्मचारियों पर कार्रवाई भी हो चुकी है, अब इस प्रकरण में और हमारे विभाग में कोई जांच शेष नहीं बची।
पूरा मामला क्या है-
लोकायुक्त जांच प्रकरण संख्या 194/17 में वर्ष 2016-17 में दो निजी कॉलेजों को गलत तरीके से छात्रवृत्ति जारी करने की शिकायत दर्ज हुई थी। जांच में पाया गया कि बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़ा हुआ था। इसमें जनजातीय कार्य विभाग मन्दसौर के तत्कालीन जिला संयोजक आनंद राय सिंहा और राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय मंदसौर के तत्कालीन नोडल अधिकारी/प्राचार्य बी.आर. नलवाया सहित कुल 12 लोग शामिल पाए गए।
जनजातीय कार्य विभाग ने अपने अधिकारियों और कर्मचारियों पर तत्काल विभागीय कार्रवाई कर दी। लेकिन जब उच्च शिक्षा विभाग के नोडल अधिकारी बी.आर.नलवाया पर कार्रवाई की बारी आई तो विभाग ने लोकायुक्त को गुमराह करने की रणनीति अपनाई। तत्कालीन प्राचार्य बी.आर. नलवाया की जगह दो अन्य प्राचार्यों—एल.एन. शर्मा और नंदकिशोर धनोतिया—को आरोप पत्र जारी कर नई जांच समिति गठित कर दी।
दोनों प्राचार्य बार-बार कहते रहे कि इस घोटाले से उनका कोई संबंध नहीं है, लेकिन उच्च शिक्षा विभाग ने उनकी बात नहीं सुनी। उल्टा, मुख्य आरोपी नोडल अधिकारी बी.आर.नलवाया की शासन स्वीकृति के बिना ही पेंशन स्वीकृत कर दी। बाद में दोनों अन्य प्राचार्यों को क्लीनचिट दे दी गई।
तीन बार जांच, फिर भी गुमराह करने का खेल
यह मामला अब तीसरी बार जांच के दौर से गुजर रहा था। पहले ही आरोप सिद्ध हो चुके थे, जनजातीय विभाग ने कार्रवाई पूरी कर ली थी। फिर भी उच्च शिक्षा विभाग ने लोकायुक्त को बार-बार भ्रमित करने का प्रयास किया। 10 मार्च की पेशी में जब जनजातीय विभाग ने सबूतों के साथ जवाब दिया तो लोकायुक्त महोदय ने उच्च शिक्षा विभाग के अधिकारियों से सीधा सवाल किया—“फिर आप लोग क्या जांच कर रहे हैं?” तो कोई संतोषजनक जवाब नहीं मिला।
लोकायुक्त का सख्त एक्शन
लोकायुक्त ने अब मामले की गंभीरता को देखते हुए उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त की व्यक्तिगत पेशी लगाई है। जनजातीय कार्य विभाग ने साफ कहा है कि उनके स्तर पर जांच पूरी हो चुकी है और अब कोई शेष नहीं बचा।
मामला अब लोकायुक्त के सामने पहुंच चुका है और अगली पेशी में उच्च शिक्षा विभाग के आयुक्त को खुद जवाब देना होगा। यह प्रकरण एक बार फिर साबित कर रहा है कि छात्रवृत्ति घोटाले में दोषियों को बचाने के लिए कितना बड़ा खेल खेला जा रहा था।
पेंशन स्वीकृत करने वाले प्राचार्य पर गिर सकती है गाज
लोकायुक्त प्रकरण के बावजूद डॉ.बीआर नलवाया का पेंशन प्रकरण तत्कालीन प्राचार्य डॉ.डीसी गुप्ता ने स्वीकृत किया था। डॉ.गुप्ता ने उच्च शिक्षा विभाग से अभिमत भी मांगा था, अभिमत का जवाब आता उससे पहले ही डॉ.नलवाया का पेंशन प्रकरण स्वीकृत कर दिया। दोनो प्राचार्यों को बचाने के लिए उच्च शिक्षा विभाग लगातार झूठ पर झूठ बोलता रहा और फिर से जांच समिति का गठन कर दिया जिसमें उच्च शिक्षा विभाग के अतिरिक्त संचालक एचएल अनिजवाल और पीजी कॉलेज प्राचार्य डॉ.जेएस दुबे के अलावा जिला संयोजक जनजातीय कार्य विभाग मन्दसौर को रखा गया था।
यह कहना है इनका –
जिला संयोजक जनजातीय कार्य विभाग मन्दसौर के निर्देश पर मै लोकायुक्त महोदय पेशी में भोपाल उपस्थित हुआ था, मैने विभाग की ओर से जवाब प्रस्तुत किया है। इस प्रकरण में जनजातीय कार्य विभाग की ओर से कोई कार्रवाई शेष नहीं है – सूर्यप्रताप सिंह कछावा (सहायक ग्रेड 3, जनजातीय कार्य विभाग मन्दसौर)
Author: Yogesh Porwal
वर्ष 2012 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र हमवतन, भोपाल मेट्रो न्यूज, पद्मिनी टाइम्स में जिला संवाददाता, ब्यूरो चीफ व वर्ष 2015 से मन्दसौर से प्रकाशित दशपुर दिशा समाचार पत्र के बतौर सम्पादक कार्यरत, एवं मध्यप्रदेश शासन द्वारा जिला स्तरीय अधिमान्य पत्रकार है। पोरवाल, खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित है तथा खोजी पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित भी किए जा चुके है। योगेश पोरवाल ने इग्नू विश्वविद्यालय दिल्ली एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा और मास्टर डिग्री प्राप्त की, इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम और वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय से सायबर कानून में अध्ययन किया है।









