मंदसौर। मध्यप्रदेश में 1 मई से 17 जून 2025 तक लागू ट्रांसफर नीति के तहत विभिन्न विभागों में स्वैच्छिक और प्रशासकीय ट्रांसफर का सिलसिला चला। इस दौरान मंदसौर जिले के जनजातीय कार्य विभाग में हुए ट्रांसफर ने विवाद खड़ा कर दिया है। विभाग में अन्य जिलों से 5 शिक्षकों का ट्रांसफर उन संस्थाओं में किया गया, जहां पहले से ही कर्मचारी कार्यरत हैं। यह मामला ट्रांसफर नीति के उल्लंघन और प्रशासनिक लापरवाही को उजागर करता है।
ट्रांसफर नीति का उल्लंघन
प्रदेश में ट्रांसफर नीति लागू होने के दौरान कई विभागों में नियमों की अनदेखी की गई। भोपाल में नीति के अंतिम दिनों में मंत्रियों के बंगलों पर ट्रांसफर के लिए भीड़ लगी रही। कुछ मंत्रियों ने कैबिनेट में ही मुख्यमंत्री के सामने अधिकारियों की मनमानी की शिकायत की। कई जिलों में ट्रांसफर नीति का जमकर उल्लंघन हुआ। उदाहरण के लिए, धार जिले में 75% दिव्यांग कर्मचारी, परिवीक्षा अवधि में कार्यरत कर्मचारी, और रिटायरमेंट से 6 महीने पहले वाले कर्मचारियों के भी ट्रांसफर किए गए, जो नीति के खिलाफ है।

मंदसौर के जनजातीय कार्य विभाग में 5 शिक्षकों का ट्रांसफर अन्य जिलों से उन संस्थाओं में किया गया, जहां पहले से ही कर्मचारी मौजूद हैं। सवाल उठता है कि ट्रांसफर करने वाले अधिकारियों ने किस आधार या रिपोर्ट के तहत भरे हुए पदों पर यह ट्रांसफर किए? यह स्पष्ट नहीं है कि इन शिक्षकों को अब विभाग कहां एडजस्ट करेगा, क्योंकि एक ही संस्था में दो कर्मचारियों का वेतन आहरण संभव नहीं है।
एडजस्टमेंट का संकट
जानकारों का कहना है कि एक स्वीकृत पद पर दो कर्मचारियों का वेतन आहरण नियमों के खिलाफ है। जिले में इतने रिक्त पद भी उपलब्ध नहीं हैं कि इन 5 शिक्षकों को समायोजित किया जा सके। विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसी स्थिति में इन शिक्षकों को उनके मूल स्थान पर वापस भेजना ही एकमात्र विकल्प है। पिछले साल भी मंदसौर में अतिरिक्त कर्मचारियों के ट्रांसफर हुए थे, जिन्हें एडजस्ट करने में एक साल लग गया। हालांकि, तब जिला संयोजक के विकल्प के कारण समायोजन संभव हो सका था, लेकिन इस बार परिस्थितियां अलग हैं।
यह प्रकरण कई गंभीर सवाल उठाता है। पहला, ट्रांसफर नीति का खुला उल्लंघन क्यों और कैसे हुआ? दूसरा, भरे हुए पदों पर ट्रांसफर करने का निर्णय किस आधार पर लिया गया? तीसरा, क्या इसके पीछे कोई राजनीतिक दबाव या प्रशासनिक सांठगांठ थी? स्थानीय लोगों और जानकारों का कहना है कि बिना किसी ठोस आधार के ऐसे ट्रांसफर न केवल नियमों का उल्लंघन हैं, बल्कि शिक्षकों के भविष्य को भी अनिश्चितता में डालते हैं।
Author: Dashpur Disha
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