जबलपुर। मंदिरों में पुजारी के पद पर सिर्फ ब्राह्मणों की नियुक्ति को लेकर मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में एक ऐसी याचिका दायर हुई है, जिसने धार्मिक और सामाजिक हलकों में हलचल मचा दी है। अजाक्स (मध्य प्रदेश अनुसूचित जाति-जनजाति अधिकारी एवं कर्मचारी संघ) ने मध्य प्रदेश सरकार के 2019 के मंदिर विधेयक और पुजारी नियुक्ति नीति को हाईकोर्ट में चुनौती दी है। याचिका में दावा किया गया है कि यह नीति संविधान के खिलाफ है और हिंदू समाज के OBC, SC, ST वर्गों के साथ भेदभाव करती है।
क्या है मामला
मध्य प्रदेश सरकार ने 2019 में ‘विनिर्दिष्ट मंदिर विधेयक’ के तहत प्रदेश के 350 से ज्यादा प्रमुख मंदिरों को अपने नियंत्रण में लिया। इन मंदिरों में पुजारी की नियुक्ति के लिए अध्यात्म विभाग ने 4 फरवरी 2019 को एक नीति बनाई, जिसमें सिर्फ ब्राह्मणों को ही पुजारी बनाने का प्रावधान है। इतना ही नहीं, इन पुजारियों को सरकारी खजाने से वेतन भी दिया जाता है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह नीति संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), 15 (जातिगत भेदभाव पर रोक), 16 (नौकरी में समान अवसर) और 21 (जीवन का अधिकार) का उल्लंघन करती है।
हाईकोर्ट में गरमागरम बहस
मामले की सुनवाई मुख्य न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और जस्टिस विवेक जैन की खंडपीठ में हुई। याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर और पुष्पेंद्र शाह ने जोरदार दलीलें रखीं। उन्होंने कहा, “हिंदू समाज में OBC, SC, ST वर्ग भी शामिल हैं। फिर सिर्फ एक जाति को पुजारी बनाने का नियम क्यों? यह संविधान का खुला उल्लंघन है!” उन्होंने बी.पी. मंडल और रामजी महाजन आयोग की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि OBC को शूद्र और SC/ST को पंचम वर्ण में रखा गया था, लेकिन 1950 में संविधान लागू होने के बाद जातिगत भेदभाव और छुआछूत खत्म हो चुकी है।
वहीं, सरकार की ओर से डिप्टी एडवोकेट जनरल अभिजीत अवस्थी ने याचिका की वैधता पर सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि अजाक्स एक कर्मचारी संगठन है, जिसे ऐसी याचिका दायर करने का अधिकार नहीं। जवाब में ठाकुर ने तीखा पलटवार करते हुए कहा, “सदियों से मंदिरों में सिर्फ एक जाति पूजा करती आई है, लेकिन अब जब सरकार ने खुद पुजारी नियुक्ति और वेतन का कानून बनाया है, तो उसे संविधान के हिसाब से सभी वर्गों को मौका देना होगा।”
‘आम हिंदू को नहीं पता सच’
याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि आम हिंदू समाज को आज भी लगता है कि पुजारी बनना सिर्फ ब्राह्मणों का अधिकार है। लेकिन जब सरकार सरकारी खजाने से पुजारियों को वेतन दे रही है, तो यह नौकरी की तरह है और इसमें आरक्षण का पालन होना चाहिए। उन्होंने कहा, “अगर सरकार असमानता को बढ़ावा देगी, तो कोई भी नागरिक या संगठन कोर्ट में चुनौती दे सकता है।
”हाईकोर्ट का बड़ा फैसला
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की दलीलों से सहमति जताते हुए याचिका को विचार के लिए स्वीकार कर लिया। राज्य सरकार के मुख्य सचिव, धार्मिक एवं धर्मस्व मंत्रालय, सामाजिक न्याय मंत्रालय और लोक निर्माण विभाग को नोटिस जारी कर 4 हफ्ते में जवाब मांगा गया है।
क्या होगा आगे
यह याचिका न सिर्फ मध्य प्रदेश बल्कि पूरे देश में मंदिरों की नियुक्ति प्रक्रिया और जातिगत समानता पर बहस छेड़ सकती है। क्या मंदिरों में पुजारी के पद अब सभी वर्गों के लिए खुलेंगे? या सरकार अपनी नीति पर अडिग रहेगी? आने वाले दिन इस मामले में बड़े खुलासे और फैसले ला सकते हैं।
याचिका के पीछे कौन
याचिका अजाक्स की ओर से दायर की गई, जिसकी पैरवी वरिष्ठ अधिवक्ता रामेश्वर सिंह ठाकुर, विनायक प्रसाद शाह, पुष्पेंद्र शाह, रमेश प्रजापति और अखिलेश प्रजापति ने की। यह मामला सामाजिक समानता और धार्मिक सुधार की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
Author: Dashpur Disha
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