दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल
मंदसौर। जिला चिकित्सालय मंदसौर में विधायक प्रतिनिधि के रूप में बदलाव किया गया है। विधायक विपिन जैन ने अपने कार्यकाल के शेष ढाई वर्ष के लिए मनोहर नाहटा के स्थान पर जितेंद्र गुगर को जिला चिकित्सालय का नया विधायक प्रतिनिधि नियुक्त किया है।
इसके साथ ही विधायक विपिन जैन ने अन्य विधायक प्रतिनिधि भी नियुक्त किए है, खैर विधायक या सांसद प्रतिनिधि कोई पहली बार नियुक्त नहीं किया गया है। समय समय पर अपनी व्यस्तताओं और जनसंपर्क के लिए सांसद-विधायक अपने प्रतिनिधि के तौर पर कार्यकर्ताओं की नियुक्ति करते है। ये नियुक्ति न तो स्थाई होती है और न ही शासकीय होती है। इसके बावजूद प्रतिनिधि बनने के लिए कार्यकर्ता मशक्कत करते है। जनचर्चा में प्रतिनिधि का विषय अचानक इसलिए आया क्योंकि मन्दसौर जिला चिकित्सालय एवं स्वास्थ्य विभाग का विधायक प्रतिनिधि मनोहर नाहटा को बना रखा था लेकिन अचानक उनकी जगह पर दूसरी नियुक्ति हो गई।
जबकि पूर्व विधायक प्रतिनिधि मनोहर नाहटा ने अपने कार्यकाल के दौरान जिला चिकित्सालय की प्रशासनिक व्यवस्थाओं एवं कथित अनियमितताओं को लेकर कलेक्टर सहित अन्य उच्च अधिकारियों को कई पत्र प्रेषित किए थे। इनमें रोगी कल्याण समिति के माध्यम से वर्ष 2024 में हुई विभिन्न निविदाओं, हाउसकीपिंग, सिक्योरिटी सर्विस, मरीजों के भोजन के लिए संचालित मॉड्यूलर किचन तथा मेनपावर सेवाओं से जुड़े मामलों में कथित अनियमितताओं की जांच की मांग की गई थी। उन्होंने निविदा प्रक्रिया एवं निर्धारित शर्तों के पालन पर भी सवाल उठाए थे। जनचर्चा का विषय ये भी है कि भ्रष्टाचार की आवाज उठाना विधायक प्रतिनिधि मनोहर नाहटा को महंगा पड़ गया। सूत्र बताते है कि जिला चिकित्सालय स्थित सांची पार्लर के संचालक ने विधायक को शिकायत की थी क्योंकि वो विधायक प्रतिनिधि द्वारा उठाई गई शिकायत से आहत था।

अब विधायक विपिन जैन ने जिला चिकित्सालय में विधायक प्रतिनिधि की जिम्मेदारी जितेंद्र गुगर को सौंपते हुए उनसे अस्पताल में आने वाले मरीजों एवं उनके परिजनों की समस्याओं के समाधान, स्वास्थ्य सेवाओं के बेहतर समन्वय तथा अस्पताल की व्यवस्थाओं को अधिक प्रभावी बनाने की अपेक्षा जताई है। नियुक्ति के बाद अस्पताल की व्यवस्थाओं में सुधार तथा आमजन की समस्याओं के त्वरित निराकरण को लेकर नई उम्मीदें व्यक्त की जा रही हैं।
जिला चिकित्सालय में विधायक प्रतिनिधि की नियुक्ति के बाद आम लोगों के बीच यह चर्चा भी तेज हो गई कि आखिर विधायक प्रतिनिधि का पद क्या होता है और उसके अधिकार कितने होते हैं।
भारतीय संविधान, जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 तथा संसद एवं राज्य विधानसभाओं के नियमों में “विधायक प्रतिनिधि” या “सांसद प्रतिनिधि” नाम का कोई संवैधानिक अथवा वैधानिक पद निर्धारित नहीं है। यह नियुक्ति संबंधित विधायक या सांसद अपने स्तर पर जनसंपर्क, समन्वय तथा जनता की समस्याओं को अपने तक पहुंचाने के उद्देश्य से करते हैं।
विधायक प्रतिनिधि आम नागरिकों की शिकायतें सुन सकते हैं, अधिकारियों से समन्वय स्थापित कर सकते हैं, जनप्रतिनिधि के कार्यक्रमों का संचालन कर सकते हैं तथा विकास कार्यों से संबंधित जानकारी विधायक तक पहुंचा सकते हैं। हालांकि उन्हें किसी भी सरकारी अधिकारी को आदेश देने, सरकारी फाइलों पर निर्णय लेने, सरकारी दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने अथवा सरकारी पदाधिकारी के रूप में कार्य करने का कोई वैधानिक अधिकार प्राप्त नहीं होता।
यदि कोई व्यक्ति विधायक या सांसद प्रतिनिधि होने के नाम पर अनुचित दबाव बनाता है, सरकारी कार्यों में हस्तक्षेप करता है, धन की मांग करता है या स्वयं को सरकारी अधिकारी बताकर प्रभाव का दुरुपयोग करता है, तो उसके विरुद्ध प्रचलित कानूनों के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
कई बार विधायक या सांसद अपने प्रतिनिधियों की जानकारी जिला प्रशासन या अन्य विभागों को समन्वय के उद्देश्य से उपलब्ध कराते हैं, लेकिन इससे प्रतिनिधि को कोई सरकारी या कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं हो जाते। अधिकारी उनके निर्देश मानने के लिए बाध्य नहीं होते।
सामान्यतः विधायक या सांसद प्रतिनिधि को सरकार की ओर से वेतन, भत्ता या सरकारी कर्मचारी का दर्जा भी प्राप्त नहीं होता। ऐसे में आम नागरिकों को भी यह समझना आवश्यक है कि विधायक प्रतिनिधि जनसंपर्क और समन्वय की भूमिका निभाते हैं, न कि प्रशासनिक अथवा वैधानिक अधिकारों का प्रयोग करने की।
Author: Dashpur Disha
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