इंदौर हाईकोर्ट के दो ऐतिहासिक फैसले: नियमित पदोन्नति ही तय करेगी प्राध्यापकों की वरिष्ठता, केवल ‘पदनाम’ से कोई सीनियर नहीं माना जाएगा

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इंदौर और मन्दसौर के प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस में जूनियर प्रोफेसर को प्राचार्य बनाने के मामले में आदेश पारित कर हाईकोर्ट ने उच्च शिक्षा विभाग में हो रहे खेल की खोल दी पोल

✍️दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल

मंदसौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ ने शासकीय कॉलेजों में प्राध्यापकों की वरिष्ठता और प्रभारी प्राचार्य के पद को लेकर लंबे समय से चले आ रहे विवाद पर बड़ा फैसला सुनाया है। न्यायमूर्ति जय कुमार पिल्लई की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि सेवा नियमों के अनुसार नियमित पदोन्नति प्राप्त करने वाला व्यक्ति ही वरिष्ठ माना जाएगा। केवल उच्च शिक्षा विभाग द्वारा दिए गए ‘पदनाम’ के आधार पर किसी को सीनियर नहीं ठहराया जा सकता।

पूरा मामला क्या था
विवाद इंदौर के शासकीय कन्या स्नातकोत्तर महाविद्यालय में प्रभारी प्राचार्य के पद को लेकर उठा था। जून 2025 में तत्कालीन प्राचार्य की सेवानिवृत्ति के बाद डॉ.अशोक सचदेवा को प्रभारी प्राचार्य का अतिरिक्त प्रभार सौंपा गया था। इस आदेश को डॉ.मंजू शर्मा ने हाईकोर्ट में चुनौती दी। उन्होंने दावा किया कि वे डॉ.सचदेवा से वरिष्ठ हैं और नियम के मुताबिक प्रभार वरिष्ठतम प्राध्यापक को ही मिलना चाहिए।
डॉ.सचदेवा ने कोर्ट में अपना पक्ष रखते हुए कहा कि उच्च शिक्षा विभाग के वर्ष 2018 के आदेश के तहत उन्हें 1 जनवरी 2006 की स्थिति में ‘प्रोफेसर’ का पदनाम दिया गया था, जो डॉ.शर्मा की पदोन्नति तिथि 8 दिसंबर 2006 से पहले का है।

कोर्ट की सख्त टिप्पणियाँ और फैसला
हाईकोर्ट ने डॉ.सचदेवा के दावे को पूरी तरह खारिज कर दिया और कहा कि डॉ.सचदेवा को दिया गया ‘प्रोफेसर’ का दर्जा केवल अस्थायी और स्थानापन्न व्यवस्था थी। यह पदोन्नति किसी रिक्त पद के विरुद्ध नहीं थी, बल्कि उनके सहायक प्राध्यापक के मौजूदा पद को ही केवल नाम के लिए अपग्रेड किया गया था। डॉ.सचदेवा ने स्वयं प्रभारी प्राचार्य रहते हुए 5 जुलाई 2025 को जारी की गई वरिष्ठता सूची में डॉ. मंजू शर्मा को क्रम संख्या 1 सबसे वरिष्ठ दर्शाया था। अब वे अपनी आधिकारिक स्वीकारोक्ति से मुकर नहीं सकते।
कोर्ट ने पाया कि डॉ. मंजू शर्मा को लोक सेवा आयोग की अनुशंसा पर 8 दिसंबर 2006 को विधिवत नियमित पदोन्नति मिली थी और 2009 की आधिकारिक ग्रेडेशन लिस्ट में भी वे डॉ. सचदेवा से वरिष्ठ हैं।

डॉ.अशोक सचदेवा की याचिका मेरिट विहीन बताते हुए खारिज कर दी। 30 जून 2025 और 29 जुलाई 2025 के प्रभारी प्राचार्य नियुक्ति आदेश अवैध और मनमाना करार देते हुए रद्द। उच्च न्यायालय ने शासन को तत्काल निर्देश दिए कि डॉ.मंजू शर्मा को कॉलेज का प्रभारी प्राचार्य बनाया जाए।

न्यायालय ने साफ कहा कि कैरियर एडवांसमेंट स्कीम के तहत मिलने वाले वित्तीय लाभ या पदनाम किसी भी कर्मचारी की उस वरिष्ठता को समाप्त नहीं कर सकते, जो दूसरे कर्मचारी ने नियमित पदोन्नति के माध्यम से कई वर्ष पहले हासिल कर ली हो।

प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस में नियमों की अनदेखी
यह फैसला सिर्फ एक कॉलेज तक सीमित नहीं है। उच्च शिक्षा विभाग द्वारा मध्य प्रदेश के विभिन्न प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस में प्राचार्यों की नियुक्ति में नियम-कायदों की अनदेखी का मामला अब कटघरे में खड़ा हो गया है।

मंदसौर के राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस) में प्रोफेसर डॉ.ज्योति स्वरूप दुबे को प्राचार्य बना दिया गया, जबकि उनसे अधिक वरिष्ठ प्रोफेसर मौजूद थे। सीनियर प्रोफेसर डॉ.आर.के.वर्मा ने शासन को आपत्ति दी, लेकिन जब कोई कार्रवाई नहीं हुई तो वे हाईकोर्ट पहुंचे। कोर्ट ने सीनियर प्रोफेसर डॉ.आर.के.वर्मा को प्राचार्य बनाने का आदेश पारित कर दिया।

Yogesh Porwal
Author: Yogesh Porwal

वर्ष 2012 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र हमवतन, भोपाल मेट्रो न्यूज, पद्मिनी टाइम्स में जिला संवाददाता, ब्यूरो चीफ व वर्ष 2015 से मन्दसौर से प्रकाशित दशपुर दिशा समाचार पत्र के बतौर सम्पादक कार्यरत, एवं मध्यप्रदेश शासन द्वारा जिला स्तरीय अधिमान्य पत्रकार है। पोरवाल, खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित है तथा खोजी पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित भी किए जा चुके है। योगेश पोरवाल ने इग्नू विश्वविद्यालय दिल्ली एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा और मास्टर डिग्री प्राप्त की, इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम और वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय से सायबर कानून में अध्ययन किया है।

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