प्राचार्य डॉ.दुबे ने प्रेसवार्ता आयोजित कर कहा कि प्रो.वर्मा ने कोर्ट में गलत तथ्य प्रस्तुत किए, प्रो.वर्मा ने कहा कि प्रेसवार्ता आयोजित कर न्यायालय के आदेश पर टीका टिप्पणी करना माननीय न्यायालय की अवमानना है और साथ ही सिविल सेवा आचरण नियम 1965 का उल्लंघन है।
दशपुर दिशा । योगेश पोरवाल

मंदसौर। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय की इंदौर खंडपीठ द्वारा 31 मार्च 2206 को मंदसौर के राजीव गांधी शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय (प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस) में डॉ.जेएस दुबे की प्रभारी प्राचार्य के रूप में नियुक्ति आदेश दिनांक 24/01/2025 को स्थगित कर दिए जाने के बावजूद वर्तमान प्राचार्य डॉ. ज्योतिस्वरूप दुबे पद छोड़ने को तैयार नहीं हैं। इस मामले में प्राचार्य डॉ.दुबे ने प्रेस कांफ्रेंस कर अपनी बात रखी और उसका प्रेस नोट भी जारी किया, जबकि वरिष्ठ प्रोफेसर डॉ.राजकपूर वर्मा ने इसे न्यायालय की अवमानना करार देते हुए इसे मध्य प्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम 1965 का उल्लंघन होना बताया है।
प्राचार्य डॉ.दुबे का पक्ष
कल कॉलेज परिसर में आयोजित पत्रकार वार्ता में डॉ.ज्योतिस्वरूप दुबे ने कहा कि वे प्रधानमंत्री कॉलेज ऑफ एक्सीलेंस के प्राचार्य पद पर सीधी भर्ती प्रक्रिया के तहत नियुक्त हुए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि हाईकोर्ट ने उनकी बात सुने बिना उनके आदेश पर स्टे दिया है। डॉ.दुबे ने कहा, “मैं अपनी बात कोर्ट में रखूंगा और न्याय की उम्मीद करता हूं।”
प्रोफेसर डॉ.राजकपूर वर्मा का पलटवार
इस मामले पर प्रतिक्रिया देते हुए प्रोफेसर डॉ.राजकपूर वर्मा ने कहा कि कोई भी लोकसेवक न्यायालय के आदेश के बारे में सार्वजनिक रूप से टिप्पणी करना और प्रेस नोट जारी करना न्यायालय की अवमानना के साथ साथ मध्यप्रदेश सिविल सेवा आचरण नियम का भी उल्लंघन है।
डॉ. वर्मा ने अपनी वरिष्ठता का हवाला देते हुए बताया कि वे 08 अक्टूबर 1985 से असिस्टेंट प्रोफेसर और 01 जनवरी 2004 से प्रोफेसर पद पर हैं। जबकि डॉ. दुबे 26 जून 1994 से असिस्टेंट प्रोफेसर और 02 जून 2011 से प्रोफेसर हैं।
वर्ष 1999 में डॉ.दुबे के खिलाफ 1999 में हुई एक शिकायत के बाद उनका मंदसौर से स्थानांतरण होने और पुनः उसी महाविद्यालय में पदस्थापना की जाने के सवाल पर कहा कि शिकायत के बाद स्थानांतरण होने के बाद उन्हें पुनः उसी संस्था में पदस्थ करना स्थानांतरण नीति 2021-2022 की कंडिका 25 का उल्लंघन है। उन्होंने बताया कि यदि समय सीमा में न्यायालयीन आदेश का पालन नहीं होता तो वे न्यायालय अवमानना की याचिका दायर करने को विवश होंगे और जो भी उचित होगी विधि सम्मत कार्रवाई करेंगे।
डॉ.वर्मा ने डॉ.दुबे की प्रभारी प्राचार्य के रूप में नियुक्ति पर उच्च शिक्षा विभाग को आपत्ति दर्ज़ करवाई थी लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर वे अदालत पहुंचे थे। कोर्ट के स्टे आदेश के बावजूद डॉ.दुबे पद पर बने हुए हैं।
Author: Yogesh Porwal
वर्ष 2012 से पत्रकारिता के क्षेत्र में निरंतर सक्रिय है। राष्ट्रीय समाचार पत्र हमवतन, भोपाल मेट्रो न्यूज, पद्मिनी टाइम्स में जिला संवाददाता, ब्यूरो चीफ व वर्ष 2015 से मन्दसौर से प्रकाशित दशपुर दिशा समाचार पत्र के बतौर सम्पादक कार्यरत, एवं मध्यप्रदेश शासन द्वारा जिला स्तरीय अधिमान्य पत्रकार है। पोरवाल, खोजी पत्रकारिता के लिए चर्चित है तथा खोजी पत्रकारिता सम्मान से सम्मानित भी किए जा चुके है। योगेश पोरवाल ने इग्नू विश्वविद्यालय दिल्ली एवं स्वामी विवेकानंद सुभारती विश्वविद्यालय से जर्नलिज्म एंड मास कम्यूनिकेशन, न्यू मीडिया में पीजी डिप्लोमा और मास्टर डिग्री प्राप्त की, इसके अलावा विक्रम विश्वविद्यालय से एलएलबी, एलएलएम और वर्धमान महावीर ओपन विश्वविद्यालय से सायबर कानून में अध्ययन किया है।









