जबलपुर। मध्यप्रदेश में उच्च मातृ मृत्यु दर पर चिंता जताते हुए मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने जनरल नर्सिंग एंड मिडवाइफरी (GNM) कोर्स में प्रवेश के लिए 12वीं कक्षा में बायोलॉजी विषय को अनिवार्य करने वाले राज्य सरकार के नियमों को उचित ठहराया है। जस्टिस अतुल श्रीधरन और जस्टिस डीके पालीवाल की डबल बेंच ने शुक्रवार को दिनभर चली सुनवाई के बाद यह फैसला सुनाया।
हाईकोर्ट ने हरदा के लाल बहादुर शास्त्री व्यावसायिक अध्ययन महाविद्यालय और 39 अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिका को खारिज कर दिया। याचिका में दावा किया गया था कि 2024 में जीएनएम भर्ती नियमों में बदलाव कर बायोलॉजी को अनिवार्य करने से केवल 169 पद भरे गए, जबकि 8388 पद खाली रह गए। याचिकाकर्ताओं ने मांग की थी कि खाली पदों पर प्रवेश के लिए उचित निर्देश जारी किए जाएं।

फैसले की हो रही आलोचना
हाईकोर्ट के इस फैसले को मातृ मृत्यु दर कम करने के लिए योग्य नर्सों की नियुक्ति को जरूरी बताते हुए उचित ठहराया गया। हालांकि, इस निर्णय की आलोचना भी हो रही है। आलोचकों का कहना है कि यह नियम उन मेधावी छात्र-छात्राओं के लिए नर्सिंग करियर के दरवाजे बंद करता है, जिन्होंने आर्थिक, सामाजिक या स्कूली सुविधाओं के अभाव में 12वीं में बायोलॉजी विषय नहीं लिया, लेकिन नर्सिंग में योग्यता और रुचि रखते हैं।
आलोचकों ने तर्क दिया कि केरल, महाराष्ट्र, कर्नाटक और तमिलनाडु जैसे राज्यों में जीएनएम कोर्स में किसी भी स्ट्रीम (आर्ट्स, कॉमर्स, साइंस बिना बायोलॉजी) के छात्रों को प्रवेश दिया जाता है, और वे सफल नर्सिंग करियर बना रहे हैं। इस फैसले को मध्य प्रदेश के छात्रों के साथ भेदभावपूर्ण और शैक्षिक समावेशन के सिद्धांतों के खिलाफ माना जा रहा है। विशेष रूप से, यह उन छात्राओं को प्रभावित करेगा जो आर्थिक रूप से कमजोर पृष्ठभूमि से हैं और नर्सिंग में अपने सपनों को साकार करना चाहती हैं।
कोर्ट की सलाह
हाईकोर्ट ने सरकार को सुझाव दिया कि मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए केवल योग्य नर्सों की भर्ती ही काफी नहीं है। ग्रामीण इलाकों में स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या, एंबुलेंस की उपलब्धता और बेहतर सड़कों का निर्माण भी जरूरी है, ताकि मरीजों को समय पर इलाज मिल सके।
मामले में पक्ष
राज्य सरकार की ओर से उप महाधिवक्ता अभिजीत अवस्थी और इंडियन नर्सिंग काउंसिल की ओर से अधिवक्ता मोहन सौंसरकर ने पक्ष रखा। कोर्ट ने सरकार के तर्क को स्वीकार करते हुए याचिका खारिज कर दी।
यह फैसला जहां मातृ मृत्यु दर को कम करने के लिए सरकार के प्रयासों को बल देता है, वहीं जीएनएम कोर्स में बायोलॉजी की अनिवार्यता ने हजारों छात्र-छात्राओं के भविष्य पर सवाल खड़े किए हैं। इस मुद्दे पर आगे बहस और नीतिगत समीक्षा की मांग तेज हो सकती है।
Author: Dashpur Disha
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