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पहले सागर में कश्ती को किनारा अब झील में डूबी

0 मंत्री की कुर्सी- दिग्गी मेहरबान हुए तो जनता रूठी
0 सीएम हाउस के पूर्व किरदार से शीर्ष ने खिंचा हाथ
0 गुर्जर – शेखावत की सियासत की अजीब दास्तान

त्वरित टिप्पणी- कैलाश सनोलिया

नागदा । उज्जैन जिले की नागदा -खाचरौद विधासभा में दो बड़ी सियासती घटनाए समूचे प्रदेश में सुर्खिया में आई। किसी जमाने में तत्कालीन मुख्यमंत्री उमा भारती के कार्यकाल में सीएम हाउस में हुक्मराना रहें भाजपा के पूर्व एमएलए दिलीपसिंह शेखावत इस विधानसभा चुनाव में टिकट से हाथ धो बैठे। दूसरी चौक्काने वाली घटना चार बार के कांग्रेस विधायक कदावर राजनेता दिलीपसिंह गुर्जर को पराजय नसीब हुई। अबकि बार गुर्जर की सियासती कश्ती मानों झील के शांत जल में ही किनारा नहीं तलाश पाई। डूबी भी वहां जहां पानी कम था। मतलब वे अबकि बार भाजपा में अंर्तकलह एवं बगावती तेवर के बावजूद एक नये चेहरे से रिकॉर्ड मत 15927 मतों से हार गए। भाजपा के डॉ तेजबहादुरसिंह चौहान ने पहली बार चुनाव लड़ा। इन्हें भाजपा के पूर्व विधायक दिलीपसिंह शेखावत को दरकिनार कर संगठन ने मैंदान में उतारा। श्री शेखावत का ओहदा किसी जमाने में रूतबेदार रहा। मप्र विकास निगम में बतौर राज्यमंत्री दर्जा भी रहा। जब भाजपा में डॉ चौहान का नाम सामने आया तो भाजपा के एक धड़े के कार्यकर्ताओं ने विरोध किया। विरोध की आग भी ऐसी फैली कि उसकी आंच राजधानी तक पहुंची। राष्ट्रीय नेता कैलाश विजयवर्गीय को हस्तक्षेप के लिए नागदा आना पड़ा। कैलाश के फायर बिग्रेड से आग बाहर से तो बूझी लेकिन अंदर से सुलगती-भभकती रही। जिसका प्रदूषित धंूआ भी फैला। बावजूद श्री गुर्जर को जीत नसीब नहीं हुई। जबकि गुर्जर अतीत की सियासत में चार मेे से दो बार तो विषम परिस्थतियों में चुनाव जीते। एक बार तो निर्दलीय किरदार में भाजपा और कांग्रेस जैसी राष्ट्रीय पाटी के प्रत्याशियों को पराजित कर मप्र की राजनीति में खलबली मचा दी थी । उस समय इनकी राजनीति में ऐसी प्रतिकूल परिस्थति थी, जैसे सागर में लहरों की अटखेलियां हो और कश्ती किनारा तलाशने के लिए भंवरजाल में उलझी । बावजूद उस समय इनकी सियासती नौका को किनारा मिला और चुनाव जीत गए।
राजनैतिक विश्लेषकों की माने तो अबकि बार सारी अनुकूल संभावनाओं को दरकिनार कर श्री गुर्जर की पराजय ने उन्हें अब एकला चालों की नीति-रणनीति को बदलने के लिए संकेत दिया । इनकी पॉलिटिक्स की यह पालिसी संभवत अब वर्तमान परिवेश में अनफिट हो चुकी है। सूबे में दूसरी पक्ति के राजनेता कांग्रेस में तैयार करने की दरकार है। हालांकि इस सूबे में फिर श्री गुर्जर को आगामी चुनाव में कंाग्रेस की इस बंजरभूमि में हरियाली लाने का अवसर संभव है । उधर, श्री शेखावत की सियासत को अबकि बार चुनाव में संबल मिल सकता थाकि कि लाड़ली बहना भाजपा पर मेहरबान हुई , पर संगठन शीर्ष इनसे रूष्ट हो गया और टिकट से हाथ ंिखंच लिया। अब अगले चुनाव में इनकी सियासत की तस्वीर इसलिए धूंधली हैकि एक कदृावर राजनेता को रिकॉर्ड ंमतों से पटकनी मिली है। फिर एक क्रिटीकल सीट छिनी है।

जब चिड़िया चुग गई खेत

पूर्व सीएम दिग्गी राजा अबकि बार चुनाव प्रचार में कार्यकर्ताओं को संबोधित करने खाचरौद आए तो कथित मन के मैल को साफ कर श्री गुर्जर को बड़ा राजनैतिक नजराना देने का भरोसा दिला गए थे। इशारा मिनिस्टर बनाने का था। यहां तक बोल गए मप्र में कांग्रेस को 130 सीट मिलेगी। दिग्गी ने अफसोस भी जताया कि दिलीप के लिए कुछ कर नहीं पाया था। अब कुछ करूंगा। यह संकेत इसलिए शायद थाकि वर्ष 2018 में कमलनाथ सरकार में चौथी बार दिलीपसिंह विधायक बनने के बाद भी मंत्री पद मुनासिब नहीं हुआ था। खाचरौद में संबोधन के दौरान दिग्विजयसिंह को वर्ष 2003 में श्री गुर्जर की टिकट कटने की पुरानी स्मृति भी संभव ताजा हुई होगी। दिग्गी आगे यह भी बोल गए थेकि दिलीप मेरा छोटा भाई है। यह भाजपा के प्रलोभन से बिका नहीं था। कांग्रेस विचारधारा का इसने धर्म से निभाया। संभवत दिग्गी को टिस सता रही होगी की- दिलीपसिंह की अतीत की सियासत में जो भी हुआ नाइंसाफी हुई। चार बार की विधायकी के बाद भी मंत्री नहीं बने और पुत्र राजवर्धनसिंह दो बार में ही कैबिनेट मंत्री की कुर्सी पर आसीन हो गए। वर्ष 2003 में दिलीपसिंह ने निर्दलीय होकर इंजिन क्यों चलाया संभव उसका भी अफसोस। इस वाक्ये के थोड़े दिन पहले जीतू पटवारी जन आका्रेश यात्रा में एक जनसभा में जनता को दिलीपसिंह को गृहमंत्री बनाने का भरोसा दिला गए थे। वे स्वयं चुनाव हार गए। इस प्रकार के तमाम समीकरणों के चलते लोकतंत्र के संग्राम में भाजपा ने बाजी मारी।

एक की राह में कांटे दूसरे मे बिल्ली

भाजपा के दिलीप की राह में बिल्ली अपशकून से रास्ता काट गई और टिकट से वंचित हुए। इसी प्रकार से कांग्रेस के दिलीप की आसान राह में जनता ने नूकीले कांटे बिछा दिए। नतीजा यह हुआ कांग्रेस के दिलीप भाजपा के डाक्टर चौहान से सियासती दंगल में मुकाबला नहीं कर पाए। ये विधानसभा की सीढ़ियां चढ़ने के बजाय घर लौट आए। सियासत के गलियारों में यह पराजय अप्रत्याशित इसलिए मानी गई कि श्री गुर्जर के राजनीतिक सफर में उनकी कश्ती अतीत में तो दो बार 2003 एवं 1993 में विपरीत परिस्थतितयों में सागर के भंवरजाल में लहरों को मात देकर किनारा तलाशने में सफल हुई। लेकिन अबकि बार अनूकुल परिस्थतियों में झील में भी कश्ती बुरी तरह से लड़खडाई और डूब गई। श्री गुर्जर की अतीत की सियासत की अजीब दास्तान है। वर्ष 1993 की पहली जीत के बावजूद 1998 में एक मापदंड के दायरे में टिकट कटा। लेकिन टिकट में इनकी अनुशंसा को प्राथमिकता मिली। 2003 में कांग्रेस की प्रदेश गुटीय राजनीति के चलते इन की टिकट पर गाज गिरी। जबकि वे 1993 में जीते हुए पूर्व विधायक थे। उस समय दिलीपंसिंह गुर्जर ने निर्दलीय चुनाव लड़़ने की जोखित उठा ली। वे चुनाव चिन्ह इंजिन से 14, 429 मतों से जीत गए। यहां पर कंाग्रेस उम्मीदवार महज 9,947 मतो पर सिमट गए। इतना ही नहीं भाजपा प्रत्याशी कदावर राजनेता लालसिंह राणावत को हार मिली।

राणावत की राजनीति में रूकावट

श्री गुर्जर की 2003 में निर्दलीय जीत उस समय हुइ थी जब मप्र में भाजपा को रिकॉर्ड 173 सीटे मिली और सुश्री उमा भारती सीएम बनी। समूचे प्रदेश में भाजपा की लहर चली और ये उस कठिन दौर में जीते। इस चुनाव में भाजपा के लालसिंह राणावत विजय होते तो निः संदेह मिनिस्टर होते। वे 1990 एवं 1998 का चुनाव जीते हुए तीसरी बार के एमएलएं होते। लेेकिन उस समय दिलीप के इंजिन के पराक्रम के आगे इस वजनदार राजनेता की राजनीति को धक्का लगा। निर्दलीय चुनाव जीतने से दिलीप समूचे प्रदेश में सुखियों में आए। यहंा पर यह उदाहरण इसलिए प्रासंगिक हैकि जब प्रदेश में भाजपा की लहर चल रही हो और यहां पर निर्दलीय दो राष्ट्रीय स्तर की पार्टियों को पराजित कर विधानसभा पहुंचा था। बहुत ही प्रतिकूल परिस्थति में चुनाव जीते। अब तो अनुकूल ने भी साथ नहीं दिया और मुंह मोड़ लिया। अब चुनाव जीतना इसलिए आसान माना जा रहा थाकि भाजपा ने परांगत प्रत्याशी श्री शेखावत का टिकट काटकर एक नवाचार प्रयोग किया था। यह नवाचार श्री शेखावत एवं श्री गुर्जर के लिए अभिशाप साबित हुआ। नवाचार प्रयोग से पहले भाजपा खेमे में अर्तकलह एवं विरोध हुआ।
विरोध का साक्षी स्वर्ण महल गार्डन
भाजपा में अबकि बार टिकट बदलने से नपा नागदा उपाध्यक्ष समेत 16 पार्षदो ने त्यागपत्र दिए। संगठन के जिला स्तर के दो बड़े पदाधिकारियांे के इस्तीफे की खबरे मुखर हुई। टिकट से वंचित श्री शेखावत के पक्ष में शक्ति प्रदर्शन में भीड़तंत्र का साक्षी स्वर्ण महल गार्डन बना। इस वक्त कार्यकर्ताओं को परोसे गए खाने पर भंडारा शब्द पर आपस में महाभारत हुई। खाचरौद में भाजपा के एक कार्यक्रम में भंडारा एक नया शब्द इजाद हुआ। समाचारो में खबरें बनी भंडारे के नाम पर भीड़। मुझे याद करते तो मैं भी शरीक होता। इधर, खाचरौद में कार्यालय के उदघाटन समारोह में संगठन के जिला अध्यक्ष बहादूरसिंह बोरमुंडला की मौजूदगी में ही भंडारा शब्द के प्रति उठाए गए सवाल का प्रतिकार आम हुआ।
भाजपा में इस प्रकार की अंर्तकलह की खबरों को सुन कर कांग्रेस उम्मीदवार श्री गुर्जर को निः संदेह चुनावी तनाव के दिनों में शकून से उस रात तो गहरी नींद आई होगी। विश्वास भी हो गया हो गया होगा कि अब यह भाजपा की अ्रर्तकलह विधानसभा जाने की राह आसान करेगी। भाजपा उम्मीदवार पहली बार चुनाव मैंदान में थे। कई सर्वे श्री गुर्जर का गुणगान करते दिखे। जनता में मनोवैज्ञानिक रूख भाजपा के लिए कठिन राह का संकेत छोड़ रहा था। बावजूद पासा पलट गया।

भाजपा के ऑफर की कहानी

उधर, दिग्विजयसिंह खाचरौद में बोल गए थे- दिलीप भाजपा के प्रलोभन से नहीं बिका । इधर श्री गुर्जर बार-बार सार्वजनिक रूप से बोलते दिखे जब कमलनाथ सरकार में सिंधिया की बगावत की पटकथा लिखा जा रही थी तब उन्हें मालामाल करने का ऑफर था। यदि यह तथ्य सही है, तो पाले बदलने से उस समय श्री गुर्जर को मंत्री की कुर्सी भी मुनासिब होना बड़ी बात नहीं थी। इस कहानी पर राजनीति के चाणक्यों का कहना था कि श्री गुर्जर की उस समय का निर्णय एक बड़ी भूल थी। उनकी सियासती तकदीर ने दरवाजे पर आकर दस्तक दी थी। लेकिन जब उसकी आवाज को तवज्जो नहीं दी तो वह नाराज होकर लौट गई। उस प्रस्ताव को स्वीकार करते तो आज दूसरी बार भाजपा में मिनिस्टर की कुर्सी नसीब होती।वे इस सूबे में भाजपा की जाजम पर बैठकर अच्छी सियासती महफिल जमा कर सकते थे। इनके पाला बदलने से सूबे में कांग्रेस की भूमि पर अकाल पड़ जाता। जैसी दिग्विजय सिंह ने खाचरौद में टिप्पणिया श्री गुर्जर की राजनीति को लेकर की पूर्व में भी नागदा में कुछ बाते बोले थे। जब 2003 में श्री गुर्जर का टिकट काटा गया औेर वे निर्दलीय चुनाव लड रहे थे तब दिग्गी राजा कांग्रेस के पक्ष में चुनाव प्रचार मेंनागदा आए थे तब बोले थे- समझ में नहीं आ रहा दिलीप का इंजिन बेपटरी क्यों हुआ। अभी भी समय है समझना चाहिए। मतलब वे दिलीप के निर्दलीय लड़ने के निर्णय से वे खफा थे। ये अलग बात थीकि टिकट काटनें की कहानी में कौन किरदार था। लेकिन श्री गुर्जर उस समय प्रचंड मतो से चुनाव जीत गए। जब दूसरी बार जब दिग्गी एक नपा की चुनावी सभा में नागदा आए तो दिलीपसिंह गुर्जर की 2003 की टिकट कटने की घटना पर बोले मैं गलत था औेर दिलीप सही। शायद इस प्रकार की घटना पर ही अबकि बार दिग्गी ने खाचरौद में अफसोस जताया की दिलीप को जो मिलना था नहीं मिला। लेकिन यह सब कुछ जब याद आया जब चिड़िया चुग गई खेत। श्री गुर्जर का नाम इतिहास में तब लिखा जाता जब 15 माह की कमलनाथ सरकार में इन पर नजरे इनायत होती। मंत्री तब बन सकते थे। अबकि बार दिग्गी का संभावनाओं और कल्पना पर टीका आश्वासन था। जो हकीकत के पहले धराशयी हुआ। अभी जनता के हाथ में रिमोट था। सारांश हैकि राजनेताओं के भविष्य को संवारने की चाबी राजनेताओ की तिजौरी में नहीं, जनता के हाथों में होती है। नागदा में दो हमनाम( दिलीप) इसके उत्कृष्ट उदाहरण है।

– कैलाश सनोलिया
राज्य स्तरीय अधिमान्य पत्रकार (मप्र शासन)
( मप सरकार पत्रकारिता अवॉर्ड से पुरस्कृत)
संवाददाता हिंदुस्थान समाचार एजेंसी

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