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आग लगी और कुआं खोदने मजदूरों की तलाश

◆सवा तीन वर्ष हाथ पर हाथ धरें बैठी रही सरकार
◆शिवराज की शर्त और पांबदी की हथकड़िया
◆चुनाव की आहट से सियासत का नया पासा नागदा जिला

नागदा (कैलाश सनोलिया) । किसी जमाने में वीरान जंगल में नदी के किनारे एक गांव बसा था । एक दिन गांव में किसी ने शगूफा छोड़ दिया कि एक बस्ती में शेर आ गया । लोग अपनी- अपनी जान बचाने के लिए सुरक्षित स्थान तलाशने के लिए भागे । लेकिन शेर बस्ती में आया नहीं और यह बात झूठी साबित हुई । दूसरी बार फिर गांव में यह बात आग की तरह फैली की बस्ती में शेर आ गया । लोग बेचारे फिर सुरक्षित ठिकाने तलाशनें के लिए जान हथेली पर लेकर भागे । लेकिन इस बार भी कोई शेर नहीं आया । तीसरी बार फिर इसी प्रकार की मुसीबत का शोर-शराबा हुआ । लेकिन शेर तो नही आया लेकिन दूसरा कोई जानवर था जो कि मानव जीवन के लिए खतरा था । जब गांव में यह घटना फैली तो किसी ने विश्वास ही नहीं किया । कारण कि दो बार झूठ सामने आया था। तीसरा भी झूठ संभव है । यह घटना प्रदेश मुखिया शिवराज सिंह चौहान की नागदा को जिला बनाने की तीसरी घोषणा से पूरी तरह से सामंजस्य कर गई । इसी प्रकार से सीएम ने वर्ष 2013 एवं 2018 में भी घोषणा की थी । मीडिया में जैसी अब खबरें सुखियों में बनी तब भी अखबारों के पन्ने भरे पड़े थे । जो कि झुठी साबित हुई और शिवराज सरकार के महकमे के आला- अफसर मूकर गए कि ऐसी कोई घोषणा ही नहीं की थी ।

सांप भी ना मरा और लाठी भी ना टूटी

अबकि बार तीसरी घोषणा तो एक पवित्र स्थान मुक्तेश्वर महादेव मंदिर के परिसर में एक आमसभा में भगवान शिव को सावन माह में गवाह बनाकर शिवराज ने फिर बड़ी चतुराई से सियासती दाव पेंच से लबरेज घोषणा कर दी । अबकि बार की घोषणा में कुछ शर्त और पांबदी की कुछ हथकंड़ियां डाल दी । चुनाव के आहट के पहले बात भी बन गई ताकि जनता विश्वास कर ले और सांप भी ना मरा और लाठी भी ना टूटी । नई बात यह जोड़ी गई कि जिस तहसील की मंशा हो वही नवीन नागदा जिला सर्जन में शामिल होगी । इस घोषणा के बाद जनता से आमसभा की भीड़ से आश्वासन भी मांग हाथों हाथ नजराना मांग लिया कि भाजपा को जिताओ के नहीं । मामा सीएम बनाना चाहिए की नहीं । मीडिया का भी क्या कसूर जिस प्रकार से पूर्ववर्ती घोषणा की बडी-बडी खबरे प्रकाशित की थी इस बारे में उसी इतिहास की पुनरावृति कर दी । बताया जा रहा हैकि कलेक्टर उज्जैन को निर्देशित भी किया कि तीन दिन में अब नवीन प्रस्तावित नागदा जिले का प्रारूप भेजे । लेकिन शिवराज असली बात यह गोल कर गए कि क्या महज 75 दिन (ढाई माह) के बाद अक्टूबर के पहले सप्ताह में विधानसभा चुनाव की आचार संहिता के पहले नवीन जिला अस्तित्व में आजाएगा ।
जैसा कि रीवा जिले में मउगंज जिला बनाने की उन्होने बड़ी इच्छा शक्ति के साथ माह जनवरी में यह घोषणा की थी सारी तैयारी कर ली गई और 15 अगस्त का राष्ट्रध्वज नवीन जिला के कार्यालय पर लहराया जाएगा। लगभग 7 माह की निरंतर प्रकिया के बाद मउगंज की यह घोषणा अब चरितार्थ होने जा रही है । लेकिन नागदा के मामले में ऐसा कुछ नही किया गया । इधर,आग लगी और कुआ खोदने के लिए कुदाली और मजदूरों की तलाश में जुट गए की कहावत चरितार्थ हो रही है । इसलिए जनता को यह घोषणा चुनावी हडकंडा दिख रही है ।

जनता यह भी तो पूछेगीे

( 1) नवीन नागदा जिला सर्जन की यह जो भी पटकथा लिखी गई, विधासभा चुनाव में भाजपा के गले का क्या फंदा बना है । इस फंदे को निकालने के लिए क्या ऐसा किया जा रहा है । जनता स्थानीय सत्ता के सूरमा से यह भी तो सवाल करें कि दावा किया जा रहा था कि जिला हम बनाएंगे, तेरी किस्मत में नहीं हैं, और तारीख भी हम बताएंगे । वह तारीख कौनसी है जरा स्पष्ट कर दे तो सियासती स्वास्थ्य-सेहत के लिए बेहत्तर होता । क्या वर्ष 2023 में यह जिला अस्तित्व में आ जाएगा । यदि जवाब ना में हैं तो मात्र यह चुनावी हथकंडा है । यह लोकतंत्र है । जनता खामोश रहती है । समय आने पर आक्रोश का इजहार करती है । इसका स्वाद कांग्रेस विधायक दिलीपसिंह गुर्जर एक बार और पूर्व भाजपा विधायक दिलीपसिंह शेखावत दो बार कड़वे घूंट चख चुके हैं । अभी तक तो नागदा को जिला बनाने के लिए विपक्ष याने कांग्रेस प्रहार कर रही थी शिवराज की इस प्रकार की घोषणा के बाद अब जनता सोशल मीडिया पर मुखर हो गई है । लोकतंत्र में जनता सर्वापरि होती है ना कि राजनेता । लोकतंत्र की लगाम जनता के हाथों में हैं । इस सूबे में अहंकार की अंतिम पराकाष्ठा का ये स्वर भी गूंजे की हम ही जिला बनाएंगे और तिथि भी बताएंगे । सरकार किसी राजनेता की नहीं बल्कि जनता की होती है । जनता संवारती भी है,और जनता ही सियासती शतरंज का खेल भी बिगाड़ती है । झूठ की नींव पर कभी इमारत खड़ी नहीं होती । होती है तो खंडहर में तब्दील होने में देरी भी नहीं लगती ।
(2) यह भी तो सवाल जनता को कचौट रहा हैकि कमलनाथ सरकार लगभग 38 माह पहले गिरी थी। उसके बाद शिवराज सरकार अस्तित्व में आई। यह सरकार नागदा को जिला बनाने के मामले में साढे तीन वर्ष तक क्यों हाथ पर हाथ घरे बैठी रही। अब चुनाव की आहट हुई और जिला बनाने की स्मृति ताजा हो गई। सवा तीन वर्ष खूंटी तान खर्राटे में गूजार दी। नवीन जिला सर्जैन के लिए कई प्रकियाओं से गुजरना पड़ता है जिसमें लगभग 5-’6 माह का समय संभव है। दावे -आपतियों के बाद अधिसूचना जारी करने के लिए भी मंत्रिमंडल में पारित करना होगा। दावे आपत्तियों के लिए 30 दिनों से लेकर 90 तक का समय निर्धारित है। फिर कलेक्टर कहा बैठेंगे एसपी का कहां होगा यह प्रकिय्रा भी पूरी करना होगी।

पूत के पाव पालने में

बड़ा सवाल महज अब 75 दिन बाद आचार संहिता के शेष है।चुनाव में चार माह। क्या यह सब कुछ हो पाएगा। यदि नही ंतो यह चुनावी एक पांसा है। ताकि जनता को भ्रमित कर यह बताया जा सकेगा कि हमने घोषणा की है। घोषणा तो पूर्व में भी 2 बार हो चुकी थी। अब तीसरे घोषणा के पूत के पांव पालने में दिख रहे हैं।
(3) जनता यह भी तो पूछंगे कि जिस प्रकार से अभी कलेक्टर को तीन दिन मे मसौदा का प्रारूप भेजने के लिए कहा जा रहा है, इस प्रकार की प्रारूप अभी तक तीन बार कलेक्टर उज्जैन ने भेजे हैं। एक प्रारूप वर्ष 2011 की जनगणना नहीं होने से स्वीकार नहीं हुआ। दूसरा मंजूर हुआ, लेकिन शिवराज सरकार की नीयत में खोट रही और जून 2012 में यह प्रस्ताव भाजपा सरकार में खारिज कर दिया था। जबकि कोई दावे आपतियां आमंत्रित नहीं की गई थी । यहां तक मंत्रिमंडल में भी प्रस्ताव नहीं लाया गया ओैर एक राजस्व विभाग के एक अधिकारी ने इस टीप के साथ खारिज किया थाकि नागदा को जिला बनाने के तथ्य उभर कर सामने नहीं आए हैं। जब पहले तथ्य उभर कर सामनें नहीं आए तो अब कहां से नए तथ्य आ रहे हैं।

पाप दाढी वाले का और सजा मूंछ वाले को

(4) वर्ष 2013 का चुनाव भाजपा प्रत्याशी ने नागदा को जिला बनाने की पहली प्राथमिकता का आश्वासन देर चुनाव लडा और जीत भी मिली। लेकिन क्या जिला बना और वे बैरंग विधानसभा से घर लौट आए। फिर दोष मढा कि पाप उसने किए जिसका बोझ मुझ ढोना पड़ रहा है। समझ में नही आया हिदु घर्म में जो पाप करता उसको ही सजा मिलती है। यहां तो पाप दाढी वाले ने करें ओर सजा मूंछ वाले का कैसे मिल गई। यह बात गले नहीं उतरी।
(5) कमलनाथ सरकार ने 18 मार्च 2020 को नागदा को जिला बनाने का प्रस्ताव पारित किया था। इस प्रस्ताव को शिवराज सरकार मंत्रिमंडल उपसमिति ने क्यों चुनौती दी और उपसमिति की मंशा नस्तीबद्ध हुई । जब नीयत स्पष्ट थी तो उसी समय कमलनाथ सरकार की प्रकिया दावे आपत्यिों को आगे बढाना थी। मंत्रिमंडल में वे लोग होते हैं जिनको जनता ने प्रजातांत्रिक तरीके से चुन कर भेजा है ।

यह रास्ता संभव बशर्त इच्छाशक्ति

नवीन जिले का सर्जन दो प्रकार से होता है- 1 कलेक्टर को अधिकार होता है वह नवीन जिले की सीमा का निर्धारण ताबड़तोब में तुरंत नया जिला बनाकर प्रस्तावित जिले पर कलेक्टर बैठाने की प्रकिया कर सकता है। यह प्रकिया महज 15 दिनों में सभव है। जिला सर्जन की जो विधि सम्मत प्रकिया दावे- आपतियां और अधिसूचना आदि बाद में की जा सकती है। स्थानीय सत्ता के सुरमा वास्तव में नागदा को जिला बनाने की मंशा है तो इस प्रकिया को अपनाया जा सकता है। आचार संहिता के पहले यह संभव है। बशर्त इच्छा शक्ति होना चाहिए। नही ंतो फिर जिले के नाम पर चार माह बाद वोट की झोली फैलांएंगे। 2 दूसरा प्रकिया लम्बी है जिसमे मत्रिमंडल में अधिसूचना का प्रस्ताव पारित करना होगा। दावे- आपत्यिों कें लिए समय देना होगा। उनका निराकरण भी करना होगा। जोकि लंबी प्रक्रिया है,अब चुनाव के पहले ऐसा करना संशय है ।

– कैलाश सनोलिया
संवाददाता बहुभाषी हिंदुस्थान समाचार एजेंसी
प्रदेश स्तरीय अधिमान्य पत्रकार नागदा

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